छत्रपती राज्याभिषेक उत्सव

युगपुरषोकि स्मृती प्रेरणादायी होती है|अत:हम रामनवमी और गोकुळ अष्टमी उत्सव मानकर हमारी सांस्कृतिक स्मृती जगाकर नयी पिढी को प्ररणा देते है|इसी प्रकार १५ अगस्त और २६ जनवरी को उत्सव मानकर राजनीतिक और गणतंत्रीय स्मृती जगाकर नयी पिढी को प्रेरणा देते है|छत्रपती शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह सोहळा भारतीय इतिहासकी एक अनन्य साधारण घटना है|शताब्दीयो के बाद एक हिंदू राजा का एक सार्वभौम राजा के रूप मे राज्याभिषेक हुवा था|गुलामी का विरोध करके ‘हिन्दवी स्वराज्य’स्थापित करके भारतीय राजनितिमे शिवारयने युगपरिवर्तन किया था| यावनी अंधकार नष्ट करके शिवाजी के रूप में स्वतंत्रता का सूरज निकला था | जिससे भारतीय आकाश चमक उठा|राज्याभिषेक समारोह इस कार्य का चरमबिंदु था | दक्षिण भारत के पलेगर और नायक,ब्युनदलखंड के महाराजा छत्रसाल,राजस्थान के मिर्ज़ाराजा जयसिंह और रामसिंग तथा असाम के लसित बाद फुकन अदिने शिवाजी के कार्य से प्रेरणा लेकर यावनी गुलामगिरी नष्ट करनेका अपने अपने ढंगसे प्रयास किया था | सच देखा जाये तो भारतीय राष्ट्रवाद का प्रारंभ शिवाजी के कार्य से हुआ है|

इससे पहले हर प्रान्त के क्षत्रिय अपने अपने राज्यकी सोचते थे|शिवाजी महाराजने ही यह राष्ट्रीयता की दृष्टी दी | शिवाजी महाराज के अनमोल प्रेरणादायी कार्य का वर्णन करते समय ‘शिवकालीन महाकवि भूषण लिखते है –

” बेद राखे बिदित पूरण परसिद्द राखे
राम नाम राख्यो अति रसना सुधर में |
हिंदुन की चोरी,रोटी राखी है|सिपाहीं की,
कांधे में जनेऊ राख्यो,माला राख्यो गरमें |
मीडी राखे मुग़ल,मरोड़ी राखे पातशाह,
बैरी पीसि राखे,बरदान राख्यो कर में |
राजन की हद्द राखी तेगबल शिवराज,
देव राखे देवल,स्वधर्म राख्यो घर में | ”
इसी कारन विविध भाषओमे ४०० से अधिक साहित्यिक रचनाए नयी पीढ़ी को प्रेरणा देने के लिए लिखी गयी है|

राज्याभिषेक प्रसंग का महत्व स्पष्ट करते समय शिवकालीन बरवरकार कृष्णाजी अंनत सभासद लिखते है-इस कारन “इस युग में सर्व पृथ्वी पर म्लेंच्छ बादशाह,एक मराठा पातशाह छत्रपति हो गया यह घटना कोई सामान्य घटना नहीं है !”

सभासद को यह घटना असामान्य क्यों लगाती है
क्यूंकि महाराष्ट्र में राजे शिर्के राजे मोरे,राजे निंबाळकर थे अन्य जगह भी मिर्ज़ाराजे जयसिंह थे |परन्तु वे सार्वभौम रजा नहीं थे | यवनों के अंकित रजा थे | शिवाजी महाराज राज्याभिषेक समारोह के कारन सार्वभौम रजा बन गए थे | इसी कारन यह असामान्य घटना थी |

राज्याभिषेक की आवश्यकता:-
आदिलशाह,मुग़ल,पुर्तुगामी,हबशी,अंग्रेज शिवाजी को शाहजी के विद्रोही पुत्र और लुटेरा मानते थे |सार्वभौम राजा नहीं मानते थे| शुन्य से ‘हिन्दवी स्वराज्य ‘ की निर्मिती करनेवाले शिवाजी के राज्य को धार्मिक और राजनितिक मान्यताकी अवश्यकता थी| जिस प्रकार विवाह के बिना गृहस्ती व्यर्थ होती है|उसी प्रकार राज्याभिषेक के बिना स्वराज्य व्यर्थ होगा|ऐसा न हो इसलिए राज्याभिषेक की आवश्यकता थी|इस समारोह से उनके राज्य को मान्यता प्राप्त हो गयी और जनता में सिंहासन निष्ठा निर्माण हो गयी |इसी निष्ठा के कारन मराठोने २६ साल मुघलोंसे संघर्ष किया और मुग़ल सम्राट की कब्र महाराष्ट्र में बनाई|

दक्षिण दिग्विजय के जाते समय शिवाजी महाराज गोलकुंडा गये तो कुतिबशाहने एक सार्वभौम राजा के रूप में उनका स्वागत किया|इस समारोह को यादगर बनाने के लिये महाराजने ‘राज्याभिषेक शक ‘का प्रारंभ किया|अपने नाम के सिक्के प्रचलित किये|यावनी सांस्कृतिक व भाषिक आक्रमण रोकने के लिये ‘लेकन प्रशस्त ‘ग्रन्थ की निर्मिती करके मराठी लेखन प्रणाली प्रारंभ की|”राज्य व्यव्हार कोष”की निर्मिती करके अरबी और फारसी भाषा का मराठी भाषापर होने वाला आक्रमण रोका|

रमई पंडित का ‘शुन्य पुराण’,नृसिंह शेष का’शुद्राचार शिरोमणि’ में वर्णित कलियुग कल्पना और ‘नन्दनतम क्षत्रिय कलम ‘ एन सभी अन्धाश्रधाओं को शिवाजी महराज ने ख़ारिज कर दिया और भारत वर्ष में आजादी के लिये एक नया उस्ताह भर दिया.और भारतीय नाविकदल की स्थापना की|’शुद्दी बंदी ‘नियम तोड़कर नेताजी पालकर और बजाजी निमबालकर, जो मुसलमान बनाये गये थे उन्हें शुद्ध करके उन्हें फिरसे हिन्दू धरममे लिया गय |एक अभिषिक्त रजा होने से ही महाराज ये क्रन्तिकार्य पूर्ण कर सके |

इस राज्यभिषेक समारोहसे संपूर्ण भारत वर्ष में आत्मविश्वास निर्माण हुआ,नवचैतन्य निर्माण हुआ |यावनी पथन और हिंदुओंके उत्थान का यह समारोह परिवर्तन बिंदु है|

शिवाजी सिर्फ महाराष्ट्र के ही नहीं वे तो भारतीय वैश्विक भी है |इस सन्दर्भ में सर जदुनाथ सर्कार लिखते है –
“शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता नहीं थे,अपितु मध्यकालीन भारत के सबसे बड़े रचनात्मक ,प्रतिभासंपन्न व्यक्ति थे|………शिवाजी जैसे ‘राजा के रूप में एक सच्चे नायक ‘की स्मृति संपूर्ण मानव जाती के लिये लोगोंकी आशाओंके स्तंभ विश्व की एछओंके केंद्र,ह्रदय को जीवन प्रदान करके ,कल्पना को प्रज्वाल्वित करने तथा उछातम प्रयासोंके लिये आनेवाली पीढ़ीयां के मस्तिस्क को प्रोस्ताहित करने का निमित एक नष्ट न होनेवाली एतिहासिक दरोहर क रूम में विद्यमान है |”

यह समारोह ६ जून १९७४ इ.में संपन्न हुआ था |अंग्रेज कैलेंडर की दुनिया में चलता है|भारतीय पंचांग के अनुसार यह समारोह कुछ लोग मानते है |यह तिथि हर साल नये तारीख को अति है |अंग्रेजी तारीख ६ जून को ही यह समारोह मानना चाहिए|समाज में फूट डालनेवाले कुछ लोग जान्भुजकर यह समारोह तिथि के अनुसार मानते है|यह बंद होना जरुरी है |

डॉ. वसंतराव मोरे
२०५ रिंगरोड, फुलेवाडी, कोल्हापूर